स्याही

स्याही खरीदे वक़्त हो चला…..
शब्द लफ्ज़ words एक जरिया हैं कुछ गुफ़्तुगू करने का, स्याही से कागज़ पर लिख दो तो गुफ़्तुगू खुद से हो जाती है या जुबां से बोल दो तो जमाने से, पर स्याही खरीदे वक़्त हो चला,

शब्द अब कागज़ की जगह जुबान से ही बोलता हुँ ,जुबान ओर शब्द की इतनी बनती है कि रोज़ ना जाने कितने तरीके के झूठ बुलवाते है मुझसे ,इसलिए अब बस जामने से झूठ बोलता हूं और झूठ सुनता भी हूँ। आज भी कुछ कोरे कागज रोज़ झांकते हैं किताबों और रददीयों के ढेर में से ,वो हैप्पी friendship डे वाली कलम भी रखी है वहीं बीच में, पर स्याही खरीदे वक़्त हो चला।

एक अरसा से बीत गया जब पहली बार कुछ शब्द धुढ के लिखे थे। ये इश्क़ ही था शायद, जो पलकें झपकने मैं भी नए शब्द मिल जाते थे , कभी मौसम रूहानी होता तो कभी दिसंबर मैं गिरती बारिश, कभी धूप में गिरती परछाई उसकी, तो कभी सर्दी में चाय की चुस्कियां लेती वो, शायद उसकी हर बात पे एक शब्द मिल ही जाता था मुझे कागज़ पर उतारने को, एक अरसा बीत गया, बात अभी भी कुछ बाक़ी हैं उसकी ,पर स्याही ख़रीदे वक़्त हो चला।

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